लूणी के फींच में ऑनलाइन गेम में 40 हजार रुपए हारे 9वीं के 15 वर्षीय छात्र ने खुदकुशी कर ली। 31 मार्च को घर से निकले इस छात्र का शव सोमवार को मंदिर के टांके में मिला। ऑनलाइन गेम और गैम्बलिंग में फंस कर बर्बाद हो रहे बचपन के ऐसे मामले आए दिन सामने आ रहे हैं। कई बच्चे अपने माता-पिता तक हाथ उठा देते हैं तो कई घर छोड़ने व खुदकुशी की धमकियां दे रहे हैं। वे झूठे बोलने, मिर्गी, चिड़चिड़ेपन और बहुत अधिक आक्रामकता के शिकार हो जाते हैं। एक से 5 साल तक के बच्चों का बौद्धिक विकास तक बाधित हो रहा है। भास्कर ने इसे लेकर एक्सपर्ट्स से बात की।
क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. नम्रता मेहता ने बताया कि अगर कोई बच्चा कई महीनों से रोज एक घंटे से अधिक मोबाइल गेम खेल रहा है तो यह खतरे के संकेत हैं। वह एक तरह की मानसिक बीमारी गेमिंग डिसऑर्डर का शिकार हो चुका है। लगातार मोबाइल गेम खेलने के कारण बचपन से ही बच्चे के दिमाग में हैप्पी हार्मोन के प्रारूप डोपामाइन का रिलीज ज्यादा होने लगता है। बच्चे के दिमाग को इसकी आदत लग जाती है। फिर उसे सबकुछ अच्छा ही चाहिए होता है। थोड़ा सा दुख या परेशानी वे बर्दाश्त नहीं कर पाते।
डोपामाइन… यानी मोटिवेशनल हार्मोन, इसकी अधिकता घातक
मस्तिष्क के 4 प्रकार के हैप्पी हार्मोन्स में से एक डोपामाइन होता है। वैसे तो ये बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए जरूरी है, लेकिन अधिक मात्रा में रिलीज होना घातक है। इसे मोटिवेशन हॉर्मोन भी कहा जाता है, जो ध्यान, एकाग्रता व प्रेरणा के लिए जिम्मेदार होता है। मोबाइल गेम की लत से बच्चों में यह अधिक रिलीज होने लगता है। इससे उनकी पूरी एकाग्रता मोबाइल गेम पर केंद्रित हो जाती है। मोबाइल से दूर होते ही बेचैन-परेशान होने लगते हैं।
केस-1; पबजी की लत में पढ़ाई छोड़ी, मां ने टोका तो हमला किया
शास्त्रीनगर निवासी एक दंपती फर्स्ट ईयर में पढ़ रहे बेटे का इलाज कराने डॉक्टर के पास गए। उन्होंने बताया कि डेढ़ साल पहले तक बेटा पढ़ाई में होशियार था। फिर अचानक परीक्षा में नंबर कम आने लगे। कारण पूछा तो बोला- पढ़ाई में मन नहीं लगता। उसे पबजी गेम की थी। कई बार समझाने पर भी नहीं माना। मां ने डांटा तो गुस्से में उन पर नुकीली वस्तु से वार कर दिया।
केस-2; मोबाइल में डूब चार साल की उम्र तक बोलना ही नहीं सीखा
सरदारपुरा के एक दंपती बच्चे को लेकर डॉ. नम्रता के पास आए। बच्चा चार साल का हो चुका है, लेकिन अब तक ठीक से बोल नहीं पाता। पता चला कि वह दो साल कि उम्र से मोबाइल चला रहा है, पहले कार्टून देखता था फिर गेम खेलने लगा। इसके चलते सामाजिक रूप से परिजनों, दोस्तों व रिश्तेदारों से जुड़ नहीं पाया। इसी कारण बोलने की क्षमता विकसित नहीं हो पाई।
केस-3; गेम में पैसे लगाने के लिए माता-पिता के क्रेडिट-डेबिट कार्ड तक चुरा लिए
साइबर सुरक्षा केंद्र पुलिस विश्वविद्यालय के उपनिदेशक लेफ्टिनेंट अर्जुन चौधरी ने बताया कि मोबाइल गेम में नए हथियार आदि खरीदने के लिए रुपए मांगे जाते हैं। ऐसे कई केसेज हमारे पाए हैं जिसमें बच्चे ने माता-पिता के क्रेडिट-डेबिट कार्ड से इसके लिए पेमेंट कर दिया। खाते से बड़ी रकम निकलने के बाद घरवालों का पता चला। ठगी के अंदेशे में पुलिस की शिकायत की गई अौर मामले की जांच में चाेर घर के बच्चे ही निकले।
एप मानसिकता पढ़कर नए-नए चैलेंज देते हैं
भास्कर एक्सपर्ट, पुनीत राव, सॉफ्टवेयर इंजीनियर
मोबाइल गेम की एप बच्चों की मानसिकता को पढ़कर नए-नए चैलेंज देती है। वे चैलेंज को पूरा कर लेते हैं तो बहुत खुश होते हैं। गेम में उन्हें सुपरमैन, स्पाइडर मैन, हल्क जैसे कैरेक्टर मिलते हैं, जिन्हें बच्चे खुद से रिलेट करते हैं। फिर उसी के हिसाब से उन्हें एक साथ पिक्सेल उपलब्ध करवाए जाते हैं। बच्चे के दिमाग को यह बहुत अच्छा लगता है, फिर उन्हें लत लग जाती है। इतनी सारी चीजें एक साथ उन्हें किताब, अखबार या मैगजीन पढ़ने में नहीं मिलती, इसलिए वे पढ़ाई व सोशल एक्टिविटी से दूर होने लगते हैं।
बचाव के सुझाव
- मोबाइल गेम के बजाए शारीरिक गतिविधियों पर ध्यान दें।
- मोबाइल से जितना हो सके दूर रखने की कोशिश करें।
- ऑनलाइन पढ़ाई के दौरान नजर रखें।
- चिड़चिड़ापन, अकेलापन बढ़ें तो डॉक्टर की सलाह लें।
- किताब पढ़ने की सलाह दें, शुरुआत में जो बच्चा पढ़ना चाहे।
- इंटरनेट पर अच्छे आर्टिकल हैं, उन्हें पढ़ने के लिए कहें।

Author: liveindia24x7



